अब नहीं रही समाज सेवा की भावना

अक्सर देखा जाता है कि कोई भी व्यक्ति नेता तो यही कहकर बनता है कि उसको समाज सेवा करनी है लेकिन जब गलती से वह व्यक्ति नेता बन जाता है तो समाज सेवा को दरकिनार कर वह केवल अपनों की सेवा व अपनी तिजोरी भरना शुरू कर देता है और समाज सेवा के नाम पर आम जनता को बेवकूफ बनाता रहता है।  चुनावों के दौरान चाहे वह नगर निगम या नगर पालिका का चुनाव हो, चाहे विधान सभा, लोक सभा या जिला पंचायत आदि का चुनाव हो हर छोटा बड़ा नेता पार्टी टिकट पाने की जुगत में लग जाता है जिस कारण कभी कभी उसको भारी रकम भी अदा करनी पड़ती है और जिन नेताओं को टिकट नही मिल पाता या तो वो पार्टी से बगावत कर देते हैं या फिर आपस में जूतपतरम पर उतारू हो जाते हैं। किसी भी राजनैतिक पार्टी में टिकट बंटवारे के समय अक्सर देखा गया है कि पार्टी के नेता टिकट पाने को लेकर काफी गंभीर रहते हैं चाहे कोई बड़ा नेता हो या छोटा कोई किसी की लिहाज नहीं करता। अक्सर देखा गया है कि छुटभैया नेता भी टिकट न मिलने पर नाराज होकर अपने सीनियर नेता के कपड़े तक फाड़ डालते हैं जो कि किसी भी पार्टी के लिये बहुत ही निंदनीय बात है हर कोई अपने स्वार्थ के चलते ही पार्टी में टिका हुआ है अगर उसका स्वार्थ पूरा नहीं होता तो वह बगावत पर उतारू हो जाता है जिससे यह बात साफ हो जाती है कि आज की राजनैतिक पार्टियां अपना मूल सिद्वांत खो चुकी हैं अब राजनीति जन सेवा नहीं बल्कि धन सेवा यानि धन कमाने खाने का जरिया बन गयी है जिस कारण समाज में तरह तरह के अपराध हो रहे हैं और उनको रोकने वाला कोई नहीं है और जिनको चुनकर जनता लोकसभा या राज्य सभा में भेजती भी है तो ऐसे जनप्रतिनिधियों ने अपनी औकात जनता को दिखा दी है। आज राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि अब ज्यादातर नेता चाहे वह किसी भी पार्टी के ही क्यों न हो अपनी अतिमहत्वकांक्षा के चलते किसी की सुनने को तैयार नहीं हैं। जिस कारण राजनीति सिर्फ कुर्सी बंटवारे का अखाड़ा मात्र बनकर रह गयी है और ऐसा लगता है जैसे किसी भी पार्टी को अब जन सेवा से कोई सरोकार ही न रह गया हो।


बालेश गुप्ता